शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

मन्त्रमुग्धा

बरसों बाद
देखी देह
निर्वसन

मछली -सी
बल खाती
अपने में

मन्त्रमुग्धा

बरसो बाद
देखी देह
उसने भी
निर्वसन

कांटे-सी
तीखी
बींधती

बीच में था जल
ठहरा

पिरोई जा रही थी
जिसमे
आवा-जाही

जीवन
मृत्यु
की 

मुझे चाहने वाला ईश्वर होगा

मुझे  चाहने वाला
ईश्वर होगा
मुझ पर बिखरे तारो को
अपने होटो से चुनता

रखता सीने पर
अपने

वह रात को पसरा होगा
रात की तरह

मेरी देह उसे
धारेगी

सपने में तारो की गुहार होगी
हमे ईश्वर से बचाओ

तब मै उन्हें अपने बालो में
छिपा लूंगा

तब तुम आओगी
मेरे सर को
अपने सीने से लगा
गुम
हो
जाने


शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

तुम्हारा तकिया मैं चुरा न लूँ

बादल जब आकाश से चले जायेंगे
तब तुम
किसी को
याद करोगे

किस तरह उसे तुम सांत्वना दे पाओ

हम अब तभी
मिलेंगे अपनी
मच्छर दानियो से  बाहर
एक दूजे को देनी होगी जब
एक दूसरे के आसपास के
किसी मरण की सूचना

ये ख्याल रखते कि
मेरा तकिया तुम
तुम्हारा तकिया मैं
चुरा न लूँ

ये भी एहतियात बरतना होगा कि
कन्धो पर शव हो
बंदूक
कुछ
 देर को
न
सही

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

रात किसी के तकिये पर था उसे जागना

हथेली पर किसी की
रेखाओं पर
पीपल का पत्ता

जिस पर एक बूँद
ठिठकी
चाँद उसी में
उगना था

रात किसी के तकिये पर
था उसे जागना

रात ही किसी की देह पर
चहल कदमी
थी होनी

किन्ही हथेलियों पर
रखी जानी थी
अज्ञात अदृश्य
हथेलियाँ

जिन्हें फिर
अपने अपने चेहरों
पर रख लेनी थी

तलवार की धार पर सपनो  को
था आना 

सोमवार, 22 जुलाई 2013

बिस्तर पर किसी के डूब मरने की छपाक

आईने को देखता
देखता हूँ
उस से लिपट गया

मेरा मौन
झील सा नही
चट्टान सा
हो

जिसमे मैं
जीवाश्म सा
पाया
जाऊँ

अभी तुम्हारे
द्वार पर मेरी छाया
ताजा टूटे
पत्ते सी

और बिस्तर पर किसी के डूब मरने की छपाक


गुरुवार, 18 जुलाई 2013

उसकी आवाज कोई उतरी हुई केंचुली हो

अभी जब चाँद  को काला बिल्ला आधा नोच गया
उसी दरम्यान किसी ने सूनी गली में अपने घर का दरवाजा खोला और अंधी आँखों से देखते कहा
किससे  मिलना है
कौन हो
कहाँ से आए हो
क्यों आए हो
किसने भेजा

उसी वक्त किसी दूसरी गली की बंद खिड़की से किसी ने
किसी का चेहरा
फेंका

उसी वक्त किसी की छाती पर
टिका चेहरा
गीली राख
में तब्दील हुआ

सैकड़ो टूटे तारो का हुजूम उस छाती में से गुजर गया किसी ने रोका नही

किसी के बालो में ढका चेहरा
तब देख रहा था
अन्धेरा कितना चमकीला और सुकून देता है

बरसो पुरानी दीवार के बिखरते चेहरे पर तब दो साए अपने हाथ यूं रखते है जैसे वे पक्षी हो
और इस दीवार को अपनी उड़ान में
ले उड़ेंगे

सीढ़ियों पर उन सायो का राग था

तब फिर किसी ने यूं पूछा जैसे उसकी आवाज कोई  उतरी हुई केंचुली हो

किससे  मिलना है
क्यो…
कौन
तुम

चाँद अपना नुचा हुआ चेहरा लिए मेरी आँखों में झाँक रहा
या
मै
उसकी