मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

कहे के पसरे खालीपन में मेरा सुनना ठिठुर रहा था

रात कि परछाई थी जो कल आने का कहती भुरभुरा रही थी

कहे के पसरे खालीपन में मेरा सुनना ठिठुर रहा था

धरती कोई कमरा थी किसी के ठंडे तकिये पर रखी जिसमे एक कमरे में चाय पीते किसी को किसी कि याद के भूत से पीछा छुड़ाने कि शहदीली कोशिश में जीने मरने के पुल से छलांग लगानी थी

अनिद्रा का
स्वप्नरहित
तालाब
तब
जीभ
काट
रोयेगा

रोने के भरेपन में मेरी देह हल्की हो तैरेगी 

रविवार, 1 दिसंबर 2013

स्मृति की उड़ान स्मृति सी


आकाश था अपने नीले के पड़ौस में व्यापे सफेद में 
जिसमे स्मृति की उड़ान स्मृति सी 

कोई पदचाप थी बाद में सीढियों पर जो नीद में सपनों की चट्टानों पर चिड़िया की चीख सी आकाश की छाती को बींधती 

इस दृश्य में मैंने पुकारा एक नाम 

एक नाम 

ठिठुरता कोई आया और उस पुकार को अपने सीने से लगाता 
जैसे बुहारता चला गया 

एक नाम 
आकाश है 

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

आत्मा का आकाश भी अनाथ था

शाम आज देखा शाम ने

दिन ही नही ढला
देह को छाया
ने भी
एक पल को
बिसार देने का
अहसास कराया

तब

आत्मा का आकाश
भी
अनाथ था

फिर छाया ने देह को
खुद में
समाया

अभी रात है मित्र
जो तुम हो

और रात का कोई साया
शाम नही


शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

हिलती रही हरीतिमा अनजान बन

बारिश ने बूंदे नही 

बरसाए 
शब्द 

धरा पर सुना
जड़ो ने 

और मुस्कुरा दी 

हिलती रही 
हरीतिमा अनजान बन 

छाया सी 
चेहरे पर 
तुम्हारे 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

उलझी कांटो में परछाई

उलझी कांटो में
परछाई

तब नीले  आसमान
ने खुद को
सफेद पक्षी बना

अपनी छाया का बढ़ा हाथ
उसे बाहर निकाल
परवाज दे दी

अब उस परवाज में
कांटे भी
महक रहे 

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

पीले पत्ते पर कीड़े सी धूप

पसलियों को रात
अंधेरी नीद के
मुरझाते सपने ने
रिसती चट्टान सा देखा

पुतलियो की जगह
राख के
ढूह

होटों पर ठंडा धुआँ
अंधे
सांप सा

आत्मा जैसा कुछ था
शायद

जहाँ पीले पत्ते पर
कीड़े सी
धूप