मंगलवार, 25 जून 2013

उस घर की सीढियों पर मेरे आने से पहले मेरे चले जाने के निशान थे.

जिस डायरी में वह हरी बेंच पर अल्मोड़ा में बैठा मिर्जा की काफी के भाप से अपना चेहरा ताप रहा था….
उसी में किसी पन्ने पर एंडर्सन के द्वारा अपनी इन स्विंगर से यूसुफ़ योहाना को बोल्ड करना  था ...

उसी वक्त गर्मी में तपते मुझे बियर का पहला सिप लेते पत्नी से सुनना था कि  वह नही रहा--
उसी वक्त उस हरी बेंच के सूनेपन पर एक फटी तस्वीर को आ दम तोड़ना था .

उसी वक्त नोएडा के टोल ब्रिज पर किसी का गुमनाम शव उठाया  जाना था…

डायरी के अंतिम पेज पर मुझे उसके घर जाना था जहां मेरे लिए अर्थी तैयार थी . उस घर की सीढियों पर मेरे आने से पहले मेरे चले जाने के निशान थे.

डायरी के किसी पन्ने पर हमें एक खूबसूरत चेहरा देख पान खा  अपने लाल होंट देखने थे .

अभी अल्मोड़ा में पहाड़ और यहाँ रेगिस्तान में एक धोरा दरक… ढह रहा है ....पत्रों में कूकर की सीटी बज रही है और आईने में एक अंधा मोड़ बल खा रहा है ...

उसकी तस्वीर देख तब की नन्ही बच्ची बीस साल बाद पूछती है ये मेरे सपनों में क्यों आता ....
दरवाजे  पर अभी आधी रात दस्तक है ....दूर पहाड़ पर कोइ सिसकता दरवाजा खोल रहा है .

घाटी पर जैसे सांप बिछ गया है .

2 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे आने से पहले मेरे जाने के निशान थे। मार्मिक। सुंदर ।

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