रविवार, 23 जून 2013

आशुतोष दुबे की कविताएँ -नहीं, संयोग नही यह वियोग भी नही यह श्मशान-श्रृंगार है जिसमे विरह शोभा में दीप्त एक शव दूसरे की प्रतीक्षा में कातर होता है


१-उसी घर में

मेरे आगे-आगे चल रही है
एक चीख गुपचुप-सी

अभी-अभी निकल कर आया हूँ
एक आत्मीय घर से
जहाँ पूछी सभी की कुशलक्षेम
अपनी बताई
चाय पी-हँसा बतियाया
और अच्छा लगा कि यहाँ आया

मेरे निकलने से पेश्तर
शायद वहीं से निकली है
यह गुपचुप सी चीख
मेरे आगे-आगे चलती हुई
मेरा पीछा करते हुए

और अब
मुझसे पहले
मेरे घर के दरवाजो पर
दस्तक दे रही है .
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२-खोई हुई चीजें

खोई हुई चीजें जानती हैं
कि हम उन्हें ढूंढ रहे हैं
और यह भी
कि अगर वे बहुत दिनों तक न मिलीं
तो मुमकिन है
वे हमारी याद से खो जाएं

इसलिए कुछ और ढूंढते हुए
वे अचानक हाथ में आ जाती हैं
हमारे जीवन में फिर से दाखिल होते हुए

हम उन्हें नये सिरे से देखते हैं
जिनके बगैर जीना हमने सीख लिया था

जैसे हम एक खोए हुए वक्त के हाथो
अचानक पकड़े जाते हैं

और खुद को नये सिरे से देखते हैं

जल्दी से आईने के सामने से हट जाते हैं
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३-जलाशय

तालाब में डूबते हुए
उसने सोचा
उसके साथ उसका दुःख भी डूब जाएगा

वह ग़लत था

उसके डूबते ही
तिर आया उसका दुःख सतह पर

कहा जा सकता है
कि वह जलाशय दरअसल एक दुखाशय था
जहाँ हल्के और भारी
बड़े, छोटे और मझोले दुःख तैरते रहते थे

जो देख पाते थे
वे अपने से बड़े दुखों को देख लेते थे
और लौट जाते थे

जो नही देख पाते थे
वे अपने भी दुःख उसी को सौंप जाते थे

कहने की जरूरत नही
कि वह बहुत सदाशय था
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४-डर

पृथ्वी के दो अक्षांशो पर
अपने-अपने घरों में सोए हुए
दो व्यक्ति
एक जुड़वाँ सपना देखते हैं

यह एक डरावना सपना है

दोनों घबराकर उठ बैठते हैं
दोनों का कंठ सूखता है
दोनों पानी पीते हैं
पर शुक्र मनाते हैं
कि जो कुछ भी हुआ
सपने में हुआ

दोनों अगली सुबह अपने
काम पर जाते हैं
सपने को भूल जाते हैं

डर, पृथ्वी के इर्द-गिर्द
एक उपग्रह की तरह
मंडराता है
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५- पुल

दो दिनों के बीच है
एक थरथराता पुल
रात का

दो रातो के दरमियाँ है
एक धड़धड़ाता पुल
दिन का

हम बहते हैं रात भर
और तब कहीं आ लगते हैं
दिन के पुल पर

चलते रहते हैं दिन भर
और तब कहीं सुस्ताते हैं
रात के पुल पर

वैसे देखें तो
हम भी एक झूलता हुआ पुल ही हैं
दिन और रात जिस पर
दबे पाँव चलते हैं
-------------------------[उपरोक्त कविताएँ 'यकीन की आयतें' से ]

६-शोकसभा में एक हँसी

कण्ठ के गुलेल से
वह जो छूटा हुआ एक शब्द है
कंटीले तारो के पार जाता है

मर्मस्थल से निकली
वह जो एक यातनादीप्त चीख है
अनंत में लिखती है एक मृत्युलेख

गाढ़े अँधेरे में देहों के बीच
वह जो चुप्पी है निथरती हुई
आत्माओं में रिसती है

लगातार गूंजती हुई
वह जो शोकसभा में एक हंसी है दुर्निवार
आदिम सन्देह से भर देती है दिशाओं को

सब एक-दूसरे को देखते हैं
और एक-दूसरे से बचते हैं

और जो नहीं रहा
इस तरह रह जाता है
सबके बीच
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७- जगह

एक संकुल संसार में
जो चला गया
वह अपने पीछे छोड़कर नही गया
कोई खाली जगह

उसी की जगह खाली रही
जो अब तक नही आया

बनी हुई जगहें
ईर्ष्या से देखती हैं

किस तरह
अनुपस्थिति बुनती है एक जगह
जो प्रतीक्षा करती है
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८- श्मशान-श्रृंगार

क्या तुमने कभी
किसी सब्ज दरख्त पर
गिरती हुई बिजली देखी है?

नींद में होठों पर
भटक आई मुस्कान
भ्रम है
भ्रम है दस्तक
रात तीसरे पहर अचानक
मन पर

ये कौन सी आवाजे हैं
जो शामिल हो गयी हैं हमारी आवाजो में
ये कौन से प्रेत हैं
जो हमारी आवाजों में
अपने फरमान जारी कर रहे हैं

नहीं,  संयोग नही यह
वियोग भी नही
यह श्मशान-श्रृंगार है
जिसमे विरह शोभा में दीप्त
एक शव दूसरे की प्रतीक्षा में
कातर होता है

देखो
एक पेड़ जल रहा है सामने

वह देखो
उसके नीचे
बारिश से बचने के लिए खड़े हुए हम
राख हो रहे हैं
------------------------------------[उपरोक्त तीन कविताएँ 'असंभव सारांश' से..]

2 टिप्‍पणियां:

  1. अनुपस्थिति बुनती है एक जगह
    जो प्रतीक्षा करती है
    ........................
    एक पेड़ जल रहा है सामने

    वह देखो
    उसके नीचे
    बारिश से बचने के लिए खड़े हुए हम
    राख हो रहे हैं....
    ....................
    आईने के सामने से हट जाते हैं
    --aah ....behtreen ....umda ...

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  2. arrey tum kahan ho ashutosh! main tumhari kavitaon per bahut pahale se fidaa hoon. tumhari nai kavitayen padhane k liye mera khoon sookha raha hai!

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