सोमवार, 17 जून 2013

१. सांझ है और बरसो पुराने बिना छत और दरवाजे के उजड़े घर में चूल्हा ठंडा है.जिसकी उंगलिया मेरे लिए तवे पर गर्म रोटी उतारते जल गयी.....दूर फूटी मटकी की छाया फटी पड़ी है...मेरे लिए इसे कुँए से कंधे पर लाने वाले मजबूत कंधे....ओह सब को तो मैं भगवान को सोंप आया...अब मे केंचुली सा इस खण्डहर में पड़ा हूँ.जमीन में वे नारियल के टुकड़े कोयले बन राख हो रहे जो मुझे बुरी नजर से बचाते. एक लंगड़ा मोर बिन पंखो वाला यहाँ अभी अपनी छाती फाड़ेगा....मेरे सर पर अभी एक हाथ आएगा जिसे गये जाने वालो से भी ज्यादा वक्त हो गया है.गीली लकडियाँ हमेशा गीली रहती है, आँख भले सूख जाए...सूर्यास्त होने ... होने को है अब शव नही आएगा जो बचा रह गया है वह शव से अलग नही ....ओह चिता और चूल्हे क्या रात भर ठंडे रहेंगे आज....

२. जिस तरह प्यास लगने पर माँ सूखी ...खाली मटकी में रात में लोटा डालती और मेरे मुंह लगा देती और मैं सात जन्मो का प्यासा अगले सात जन्मो की प्यास पर उस जल के सागर को बिछा देता....कल रात इसी तरह मैं राह देखता रहा...मेरी विस्मृत नीद और बेरहम सपने देख रहे थे कि कोई मेरी मटकी फोड़ रहा था....अनिद्रा में मैं विलाप के सूखे अंतहीन पसारे में सुन्न था. माँ आई थी जैसे एक मृतक दुसरे की देह उठाए उसने अपनी छाया को समेटा....मेने उसकी आँखों में देखा उसमे गीला हरा था.
उसने मेरी सारी नीद...सपनों...को उस हरे में डुबा दिया....
अभी सुबह देखा सूरज हरे समन्दर से मुँह निकाल रहा था उसकी आँखे नीद और सपनों से भारी थी.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत .....इस आगाज़ के लिए बहुत बहुत बधाई ...मुबारकबाद............आशा ही नही पूरी उम्मीद ...कि जल्द ही आपकी कलम इन खाली पन्नों को अपनी इबारतों से सज़ा देगी .............................................
    अब मे केंचुली सा इस खण्डहर में पड़ा हूँ.जमीन में वे नारियल के टुकड़े कोयले बन राख हो रहे जो मुझे बुरी नजर से बचाते...
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    मैं सात जन्मो का प्यासा अगले सात जन्मो की प्यास पर उस जल के सागर को बिछा देता....अह्ह्ह! कितना सुखद ...पर कितना सहम व्याप्त है इसके पीछे ....जहां कुछ खो जाने का डर ....ना मिल पाने का डर हमेशा व्याप्त रहता है ....और जो मिलता है ....कुछ अतीत का डर निगल लेता है ...कुछ भविष्य समेट लेता है ...और वर्तमान के हाथ आता है ...दो बूँद और मुठी भर प्यास ...साथ साथ ...बहुत खूबसूरत अनिरुद्ध जी .....
    हर शब्द ...मन कि मिट्टी को भिगोता .....हर शब्द बीज सा मिट्टी में घुल घुल जाता ....नम है मिट्टी .... घुल कर पनप जाये कोई कोंपल .....हरी सी ...नीले आसमां के तले .....

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