गुरुवार, 15 अगस्त 2013

अभी जिस गले से तुम फफकोगे वह भी तुम्हारा नही।

अक्सर शाम को लगता है जैसे बाजुओं में किसी ने अंतिम सांस ले अपनी देह गीली कच्ची  शाख सी ढीली छोड़ दी है जिसे मैं सम्हालने  में ढहता जा रहा हूँ।
जब तक हम नही मरते तब तक हम यूं ही मरते हैं.
फिर मरे अंग में ढीठ हरकत होती है और हम खुद को उठा खुद में गिर जाते है।
पूरा दिन सूना आँगन और घड़ी की टिक टिक हमारे भीतर पसरते जाते है जैसे रेतीला टीला धीमे धीमे सब कुछ को खाता आगे पसरता जाता है.
कमरे में किताबें और तस्वीरे हमारा इन्तजार करती है जिन्हें कुछ देर के लिए दीमको ने खाने से छोड़ दिया है।  यह उनका चश्मा है जिससे उनने मुझे आख़िरी बार टेढ़ी नजरों से देखा था, क्या उन्हें , मुझे तब पता था ?
ये उनकी चप्पले जिन पर आख़िरी भ्रमण की रेत थी।
अभी जिस गले से तुम फफकोगे वह भी तुम्हारा नही।
बाहर ठंडा भीगा अन्धेरा है जिस पर अभी तुम नंगे पाँव चलोगे। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बाहर ठंडा भीगा अँधेरा है...

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  2. पूरा दिन सूना आँगन और घड़ी की टिक टिक हमारे भीतर पसरते जाते है जैसे रेतीला टीला धीमे धीमे सब कुछ को खाता आगे पसरता जाता है......................उफ्फ्फ ....जिस गले से तुम फफकोगे वह भी तुम्हारा नही।
    बाहर ठंडा भीगा अन्धेरा है जिस पर अभी तुम नंगे पाँव चलोगे।
    उम्दा ...

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