मंगलवार, 2 जुलाई 2013

दोपहर के वीराने में कोइ आएगा और खुद को चुरा ले जाएगा.

क्या उसे पता है कि उसे क्या पता है?
क्या उसे पता है वह किसका साया है? 
क्या उसे पता है रास्तों में रास्ते खोते है? 
कि प्यास और आस अंतिम कलप है

दोपहर के वीराने में कोइ आएगा और खुद को चुरा ले जाएगा. 

मैंने जब उससे पूछा  तो उसने कहा 'हाँ मुझे पता है!' ये सुनते ही मैने देखा मै कहीं नही था. 
अब हम वहां थे जहां हम कहीं न थे. 

उसने मेरे भीतर अपनी विस्मृत हंसी की रेत पसार दी.
अचानक टीले ने जैसे मेरा भक्षण कर लिया हो मै उसके बिसारने में यूं धंसा.
मेरे होने का कोई  निशान अब वहा न था. 
केवल टीला था.

 जिस पर कभी बैठ कर कोइ विक्रमादित्य बन गया था.
आज मेरा दम घुटता जा रहा था.
कोइ कहीं न था.

1 टिप्पणी:

  1. मेरे होने का कोई निशान अब वहा न था.
    केवल टीला था.
    अद्भुत !!

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