रविवार, 14 जुलाई 2013

शव का एकांत हूँ

मृत फोन पर सूखा बादल बरसता और बरसो पहले की सिसकी हरी हो जाती
जामुनी इन्तजार में नीले का स्फटिक बदन हवा में कसमसाता

तब एक मोर किसी सूने घर की छत पर अपने सारे पंख त्याग देता ऒर अपने पैरों को चबाता

अन्धेरे कमरे में
किसी की  कोहनी पर
बेसुध लेटा  मैं
सपने में
उसके
कान में
सपने
का
भेद
फूंकता

अभी कोई तारा नही टूट रहा
अभी
आकाश
टूट
बिखर रहा

अभी आईने में
कोई छाया
मेरा आलिंगन करती
सिसक रही

अभी गुमनामी की रेत में
मेरी बदहवासी को
नमी का छल
चबा रहा

कहाँ हो तुम
यह कहने में कहाँ हूँ मैं यह देखता शव का एकांत हूँ

1 टिप्पणी:

  1. अभी कोई तारा नही टूट रहा
    अभी
    आकाश
    टूट
    बिखर रहा....
    कहाँ हो तुम
    यह कहने में कहाँ हूँ मैं यह देखता शव का एकांत हूँ
    अह! तारे का टूटना ..मुराद का पाना ...बिखरता जब आकाश ...टूटती धरा ...कौन .किससे कहे ..कहाँ हो तुम ...नही रहता कोई जहां ....तुम या मैं ..नही वहाँ ..बस हो जाता ..एका अंत ..देह का अदेह .../ अदेह का देह होना ..उफ्फ्फ्फ्फ़ ! मन की परतों के भीतर पसरता एकांत ....


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