बुधवार, 17 जुलाई 2013

दिल का सूर्य डूब रहा

रात अपना सर उठा रही है और दिल का सूर्य डूब रहा
ठंडे अंगारे ठिठुरते कनपटियो में धंस रहे

कोइ पदचाप नही


विलाप
में
कोई
घुट
रहा

मौसम
की
उमस
हमारी
देह
के
स्पंदन
को
खा
रही

कल जो सूर्य  उगेगा
लुटा
पिटा,
अंधा,
वृद्ध

वह समस्त हरीतिमा पर नीली आँखों का पथराया स्वप्न  होगा

3 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द ...
    नही होता
    कोई शब्द
    किया जाये
    जिससे
    बयाँ
    ........बस इतना ही
    इस भाव पर ...और कुछ नही .

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